सत्यनारायण व्रत कथा भगवान विष्णु के उस स्वरूप को समर्पित है, जहाँ वे सत्य, धर्म, करुणा और न्याय के प्रतीक हैं। यह व्रत न केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिए किया जाता है, बल्कि यह मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करने का भी माध्यम है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन, पूर्ण श्रद्धा और नियमपूर्वक सत्यनारायण व्रत करता है, उसके जीवन से दरिद्रता, रोग, मानसिक अशांति, पारिवारिक क्लेश और अन्य सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं। यह व्रत व्यक्ति को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है और यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कैसी भी कठिन परिस्थिति आए, यदि ईश्वर पर अटूट विश्वास हो तो हर समस्या का समाधान संभव है।
सत्यनारायण व्रत का विशेष महत्व पूर्णिमा तिथि को माना गया है। इसके अतिरिक्त गृह प्रवेश, विवाह, संतान प्राप्ति, नए व्यापार या कार्य की शुरुआत, नौकरी में उन्नति, मनोकामना पूर्ति तथा संकटों से मुक्ति के लिए भी यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है। इस व्रत के माध्यम से भक्त भगवान विष्णु से यह प्रार्थना करता है कि उसके जीवन में सत्य, सदाचार और धर्म का वास बना रहे। सत्यनारायण व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह मनुष्य के चरित्र, आचरण और सोच को शुद्ध करने की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
प्राचीन काल में एक नगर में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण निवास करता था। वह स्वभाव से सरल, सत्यवादी और धर्मपरायण था। गरीबी के कारण उसे अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता था। कई बार उसके घर में भोजन तक का अभाव हो जाता था, किंतु उसने कभी भी अधर्म, छल या असत्य का सहारा नहीं लिया। वह प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करता और यह विश्वास रखता कि एक दिन भगवान उसकी परीक्षा अवश्य समाप्त करेंगे।
एक दिन भगवान विष्णु वृद्ध ब्राह्मण के वेश में उसके पास आए। उन्होंने उस निर्धन ब्राह्मण की भक्ति, धैर्य और सत्यनिष्ठा को परखा और उसे सत्यनारायण व्रत करने की विधि समझाई। भगवान ने कहा कि यदि यह व्रत श्रद्धा, नियम और सच्चे मन से किया जाए, तो मनुष्य के जीवन से सभी प्रकार के दुख, दरिद्रता और बाधाएँ दूर हो जाती हैं। ब्राह्मण ने भगवान की आज्ञा को सहर्ष स्वीकार किया और पूर्ण श्रद्धा से सत्यनारायण व्रत किया।
कुछ ही समय में भगवान विष्णु की कृपा से ब्राह्मण के जीवन की दशा बदलने लगी। उसे धन की प्राप्ति हुई, समाज में मान-सम्मान बढ़ा और उसके घर में सुख-शांति का वास होने लगा। उसी नगर में रहने वाला एक धनवान व्यापारी यह देखकर आश्चर्यचकित हुआ कि एक निर्धन व्यक्ति कैसे इतने कम समय में समृद्ध हो गया। जब उसने ब्राह्मण से इसका कारण पूछा, तो ब्राह्मण ने सत्यनारायण व्रत की महिमा विस्तार से बताई।
व्यापारी ने भी व्रत करने का संकल्प लिया। उसने विधि-विधान से सत्यनारायण व्रत किया और शीघ्र ही उसके व्यापार में उन्नति होने लगी। धन, यश और वैभव प्राप्त होने पर उसके मन में अहंकार उत्पन्न हो गया। उसने यह मान लिया कि यह सब उसकी बुद्धि और परिश्रम का फल है और वह व्रत का उद्यापन करना भूल गया। परिणामस्वरूप भगवान सत्यनारायण की लीला से उसके जीवन में विपत्ति आने लगी। व्यापार में हानि हुई, धन नष्ट हो गया और परिवार में अशांति फैल गई।
कठिन परिस्थितियों से घिरकर व्यापारी को अपनी भूल का आभास हुआ। उसे यह समझ में आ गया कि ईश्वर की पूजा केवल लाभ के लिए नहीं, बल्कि श्रद्धा और नियम के साथ करनी चाहिए। पश्चाताप करते हुए उसने पुनः सत्यनारायण व्रत किया, विधिपूर्वक उद्यापन किया और भगवान विष्णु से क्षमा याचना की। उसकी सच्ची भक्ति और पश्चाताप से भगवान सत्यनारायण प्रसन्न हुए और उसके जीवन के सभी कष्ट दूर कर दिए। धीरे-धीरे व्यापारी का जीवन फिर से सुख, समृद्धि और शांति से भर गया।
इस प्रकार सत्यनारायण व्रत कथा यह शिक्षा देती है कि जो व्यक्ति सत्य, धर्म और श्रद्धा के साथ भगवान की उपासना करता है, उसके जीवन में कभी स्थायी दुख नहीं रहता। अहंकार, लोभ और असत्य से दूर रहकर की गई भक्ति ही सच्चा फल प्रदान करती है।