एक समय की बात है, एक नगर में एक अत्यंत धनवान साहूकार रहता था। उसके पास अपार धन-संपत्ति और वैभव था, किंतु संतान न होने के कारण उसका जीवन अधूरा सा प्रतीत होता था। यह पीड़ा उसके हृदय को गहराई तक व्यथित करती थी और वह निरंतर ईश्वर की कृपा की कामना करता रहता था। सच्ची भक्ति और अटूट विश्वास के साथ उसने प्रत्येक सोमवार का व्रत रखना प्रारंभ किया तथा नियमित रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करने लगा। उसकी आराधना निष्काम थी और पूर्ण श्रद्धा से भरी हुई थी।
उसकी निःस्वार्थ भक्ति और शुद्ध हृदय से प्रसन्न होकर माता पार्वती के मन में करुणा जागृत हुई। उन्होंने भगवान शिव से साहूकार को पुत्र का वरदान देने का अनुरोध किया। भगवान शिव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की, किंतु यह भी कहा कि वह पुत्र केवल बारह वर्षों तक ही जीवित रहेगा। यह सुनकर भी साहूकार विचलित नहीं हुआ। उसने भगवान की इच्छा को विनम्रता से स्वीकार किया और यह मान लिया कि जो कुछ भी भगवान शिव करते हैं, वही सर्वोत्तम होता है।
कुछ समय पश्चात साहूकार को पुत्र की प्राप्ति हुई। संतान सुख पाकर भी उसने अपने विश्वास और भक्ति में कोई कमी नहीं आने दी। वह पूर्व की भांति पूर्ण श्रद्धा से भगवान शिव की उपासना करता रहा और कभी भी भाग्य या ईश्वर की लीला पर प्रश्न नहीं उठाया। जीवन की कठिन परीक्षाओं, त्याग और अडिग आस्था के माध्यम से उसका जीवन सच्ची भक्ति और समर्पण का अनुपम उदाहरण बन गया।
यह पावन शिवरात्रि व्रत कथा हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति, धैर्य और भगवान शिव में पूर्ण विश्वास से मनुष्य जीवन की प्रत्येक चुनौती का साहस के साथ सामना कर सकता है। जो भक्त निष्काम भाव से आराधना करता है, उसे ईश्वर का मार्गदर्शन प्राप्त होता है, उसके सभी विघ्न दूर होते हैं और उसका जीवन आध्यात्मिक शक्ति तथा दिव्य आशीर्वाद से परिपूर्ण हो जाता है।
प्राचीन समय में एक नगर में एक अत्यंत धनवान साहूकार निवास करता था। उसके पास अपार धन-संपत्ति, वैभव और सम्मान था, किंतु संतान सुख से वंचित होने के कारण उसका जीवन अधूरा प्रतीत होता था। यह अभाव उसके मन को निरंतर व्याकुल रखता था। संतान प्राप्ति की प्रबल इच्छा से उसने पूर्ण श्रद्धा और नियमपूर्वक प्रत्येक सोमवार का व्रत रखना प्रारंभ किया और नित्य विधि-विधान से भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा-अर्चना करने लगा।
उसकी निष्काम भक्ति, तप और सच्चे हृदय से की गई आराधना से माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने भगवान शिव से साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का अनुरोध किया। भगवान शिव ने कहा कि प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार फल भोगता है, किंतु माता पार्वती के करुणामय आग्रह पर उन्होंने साहूकार को पुत्र प्राप्ति का वरदान प्रदान किया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि उस पुत्र की आयु केवल बारह वर्ष होगी। साहूकार ने इसे भगवान की इच्छा मानकर सहर्ष स्वीकार किया और पहले की भांति श्रद्धा से शिव भक्ति करता रहा।
कुछ समय पश्चात साहूकार के घर पुत्र का जन्म हुआ। संतान प्राप्ति से उसका जीवन आनंद, भक्ति और कृतज्ञता से भर गया। जब बालक ग्यारह वर्ष का हुआ, तब उसकी शिक्षा के लिए उसे काशी भेजने का निर्णय लिया गया। साहूकार ने अपने साले (मामा) के साथ बालक को यज्ञ, दान और धर्मकर्म करते हुए काशी भेजा, जिससे यात्रा भी पुण्यमय हो सके।
यात्रा के दौरान वे एक ऐसे नगर में पहुँचे जहाँ राजा की पुत्री का विवाह हो रहा था। कुछ अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण उस नगर में बालक का विवाह भी निश्चित कर दिया गया। किंतु बालक सत्य, धर्म और मर्यादा से विमुख नहीं हुआ। उसने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सत्य को लिखकर छोड़ दिया और बिना किसी लोभ या भय के अपनी यात्रा आगे बढ़ा दी।
समय के साथ भगवान शिव की लीला के अनुसार घटनाएँ घटित हुईं और बालक की आयु पूर्ण होने का समय निकट आ गया। बालक की पीड़ा और माता-पिता के दुःख को देखकर माता पार्वती का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने भगवान शिव से पुनः प्रार्थना की कि वे अपने भक्त पर दया करें और उसके कष्ट को दूर करें।
माता पार्वती की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अपनी दिव्य कृपा से बालक को पुनः जीवनदान प्रदान किया। इस प्रकार साहूकार का परिवार पुनः सुख, शांति और आनंद से भर गया। अंत में भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन देकर यह संदेश दिया कि जो भक्त श्रद्धा, विश्वास और नियमपूर्वक सोमवार व्रत तथा शिवरात्रि व्रत का पालन करता है, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।
यह पावन शिवरात्रि व्रत कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, धैर्य और भगवान शिव में अटूट विश्वास से असंभव भी संभव हो जाता है। शिव भक्ति से जीवन के सभी दुख, बाधाएँ और संकट दूर होकर भक्त को दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।